Thursday, 16 November 2017

Biography of Kartar Singh Sarabha in hindi

                 
 Biography of Kartar singh Sarabha in hindi
भारत योधो और सूरबीरो का देश है , भारत के इतेहस में देखा जाए तो आप को अनेक शूरवीर मिलेगे जिन्हों ने देश के लिए अपनी जिंदगी कुर्बान कर दी , ऐसे ही सूरबीरो की वजह से आज हम एक सवतंत्र भारत में साँस ले रहे हैं , इन सूरबीरो में से ही एक थे करतार सिंह सराभा जीनो ने 20वी  सदी में अंग्रेजो के खिलाफ जंग लड़ी जिस समय अंग्रेज पूरी दुनिया में अपनी हकूमत काइम कर चुके थे , तो चलिए हम जानते हैं सरदार करतार सिंह सराभा के जीवन के बारे में।
जनम और बचपन :  करतार सिंह सराभा का जनम 24 मई 1896 में माता साहिब कौर की कोख से हुआ , करतार सिंह के पिता का नाम सरदार मंगल सिंह था , मगर बदकिस्मती से करतार सिंह के पिता का दिहांत हो गया जिस के कारण करतार सिंह का पालन पोषण करतार सिंह के दादा जी ने किया जिन का नाम सरदार बदन सिंह था , करतार सिंह छोटी उम्र में ही पढाई के साथ साथ खेलो और दूसरी चीजों में वी अवल थे जिस के कारण उस के दोस्त उसे अफलातून बताते थे ।

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ग़दर पार्टी में शामिल होना   करतार सिंह सराभा ने उड़ीसा में अपनी पढाई पूरी की और आगे की पढाई के लिए उनोह ने 1912 में अमेरिका जाने का फैसला किया , वहा जाने के बाद उन को पढाई का खर्च उठाने के लिए काम वी करना पढता था जहाँ करतार सिंह और उन के दुसरे साथी मजदूरों के साथ अंग्रेज बुरा विवहार करते थे , जहा से करतार सिंह के मन में अंग्रेजो के लिए नफरत पैदा गई।
1913 में लाला हरिदियाल का भाषण सुन ने के बाद उनोह ने ग़दर पार्टी में शामिल होने का फैसला किया , जहा पर वोह साप्ताहिक अखबार “ ग़दर “ की सारी जिमेवारी सँभालते थे , इस अख़बार के कारण वहा रहने वाले सारे हिंदी मजदूरों को अग्रेजो के खिलाफ लड़ने और आज़ादी हासिल करने का जोश पैदा हुआ ।

भारत में वापस आना    25 जुलाई 1914 को अंग्रेजो और जर्मन के वीच युद्ध शुरू हो गया जिस के कारण अब ग़दर पार्टी के लिए एक मौका था जिस की अपील पर हज़ारो देशभग्त भारत में लौट आए और इन में से के बंदरगाहों पर पकडे गे ।
करतार सिंह सारभा वी उन में से एक थे जो के श्रीलंका के रास्ते से भारत में आए और भारत में काफी इंकलाबी काम किए जिस में से बुम्ब बनाना , हथ्यार इकठे करना और फोज में देश के आज़ादी के लिए परचार करना था ।


ग़दर पार्टी के नाकाम्ज़बी और शहीदी    ग़दर पार्टी के अनुसार 21 फरबरी 1915 को पूरे देश में एक साथ आज़ादी की लहर को चलाना था मगर ग़दर पार्टी के ही एक सदस्य किरपाल सिंह ने अंग्रेजो तक सारी जानकारी पहुंचा दी जिस के कारण 21 फरबरी से बदल कर इस की तरीख 19 फरबरी कर दी मगर इस बार वी अंग्रेजो तक सारी जानकारी चले जाने के बाद अंग्रेजो ने फ़ौज से सारे हथ्यार शीन लिए और सभी ग़दर पार्टी के सदस्यओ को पकड़ना शुरू कर दिया , पहले तो करतार सिंह और उस के साथिओ ने अफगानिस्तान भागने का फैसला किया , मगर बाद में वोह एक हमदर्द गंडा सिंह के पास गए जिस ने उन सब को गिरफ्तार करा दिया ,
करतार सिंह सारभा और इन के साथिओ के उपर डाका डालने , देशद्रोह और कातिल के मुकदमे चलाए गए जिस के कारण इन में से 24 गद्रियो को फंसी और 17 को उम्रकैद की सजा दी गई , मगर बाद में 17 को वी फंसी की सजा दे दी गई ।
16 नवम्बर 1915 को करतार सिंह साराभा के साथ उन के 6 साथिओ को फांसी दे दी गई , जब करतार सिंह सारभा को फंसी दी गई तब उन की उम्र सिर्फ 19 साल की थी , जिस के बाद सरदार भगत सिंह (Bhagat singh) वी करतार सिंह सराभा की कुर्बानी से परभावित हो कर देश की आज़ादी के लिए अपना बलिदान देने का फैसला किया .


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