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Monday, 28 January 2019

Harjeet Brar Bajakhana Kabbadi | Biography | Age | Family | Death

Harjeet Brar Bajakhana Kabbadi | Biography | Age | Family | Death

दोस्तों आज हम आपके लिए उस महान खिलाड़ी की बायोग्राफी लेकर आए हैं जिनको इस दुनिया से गए हुए तो काफी समय हो गया लेकिन कबड्डी खेल प्रेमियों के दिलों में वह खिलाड़ी आज भी जिंदा है पूरे भारत में कहीं पर भी अगर कोई कबड्डी मैच होता है तो उस खिलाड़ी का जिक्र जरूर होता है
Harjeet Brar Bajakhana Kabbadi | Biography | Age | Family | Death
Harjeet Brar Bajakhana Kabbadi | Biography | Age | Family | Death

 भारत ही नहीं बल्कि इंग्लैंड अमेरिका कनाडा जैसे देशों में भी उस खिलाड़ी ने अपनी काबिलियत के झंडे गाड़े हुए हैं । मैं बात करने जा रहा हूं सर्कल कबड्डी के मशहूर खिलाड़ी हरजीत बराड़ बजाखाना की । दोस्तों आज हम जानेंगे ऐसे खिलाड़ी की निजी जिंदगी कबड्डी कैरियर और मौत के कारण के बारे में ।

Harjeet Brar Bajakhana Kabbadi | Biography | Age | Family | Death

हरजीत बराड़ का जन्म 5 सितंबर 1973 को गांव बाजाखाना ज़िला फरीदकोट पंजाब में हुआ । बचपन से ही हरजीत की सेहत बहुत ज्यादा अच्छी थी जिसकी वजह से उनके पिता सरदार बख्शीश सिंह ने हरजीत बराड़ को कबड्डी खेलने के लिए प्रेरित किया । हरजीत बराड़ बचपन से ही बहुत अच्छी कबड्डी खेलता था

 जब Harjeet Brar Bajakhana स्कूल में पढ़ता था तो उसने अपने स्कूल को बहुत से टूर्नामेंट भी जिताए । उनकी गेम को देखते हुए उनके गांव वालों ने और उन के अध्यापकों ने हरजीत बराड़ की खेल और ज्यादा निखारा जगजीत आठवीं क्लास में था तो उस वक्त गुवाहाटी में मिनी गेम्स का आयोजन हुआ था जिसमें हरजीत बराड़ ने भी हिस्सा लिया और इन गेम्स में बहुत अच्छा प्रदर्शन किया । 
आगे जाकर हरजीत बराड़ ने स्पोर्ट्स स्कूल जालंधर में दाखिला ले लिया और पूरा ध्यान अपनी गेम पर देने लगे अपनी मेहनत और लगन के बल पर हरजीत बराड़ बड़ी बड़ी कबड्डी टीम और अकैडमी में खेलने लगा । 


  • हरजीत को पहली बारी लोगों ने तब पहचान में शुरू किया जब जैतो खेल मेले में हरजीत गया । वहां पर कुश्ती के मुकाबले हो रहे थे और वहां पर उन के दोस्तो ने जबरदस्ती उसे एक कुश्ती पहलवान के साथ कुश्ती के लिए मैदान में उतार दिया। उस मेले में हरजीत ने बहुत अच्छी कुश्ती खेली और Harjeet Brar Bajakhana  का नाम बनना शुरू हो गया । 


  • साल 1982 - 83 में कोठा गुरु के गांव में एक बहुत बड़ा कबड्डी टूर्नामेंट हुआ इस टूर्नामेंट में हरजीत बराड़ दे कनेडा से आई टीम के लिए दो रेडे डाली हरजीत की चुस्ती और चालाकी को देख कर वहां खड़े सभी लोग दंग रह गए और पूरे मैदान में बाजाखाना बाजाखाना होने लगी ।  


  • साल 1994 में हरजीत बराड़ ने पहली बार कनेडा देश का दौरा किया वहां पर उनकी कबड्डी को देख कर कबड्डी प्रेमियों हरजीत बराड़ को अपनी पलकों पर बैठा लिया जिसके बाद हरजीत ने अगले कुछ सालों तक इंग्लैंड पाकिस्तान अमेरिका जैसे और भी कई देशों में जाकर अपनी खेल के जौहर दिखाए । 

Harjeet Brar Bajakhana Kabbadi | Biography | Age | Family | Death



  • 1996 में जब कनेडा में कबड्डी वर्ल्ड कप हुआ उस वर्ल्ड कप में हरजीत बराड़ पाकिस्तान के खिलाफ खेल रहा था तो उनकी हर रेड पर ₹100000 का इनाम रखा जा रहा था और हरजीत बराड़ 2 से 3 सेकंड में ही रेड लेकर वापस आ जाता था । उनकी इस गेम को देखते हुए वहां पर खड़े एक गोरे ने माइक में जाकर बोला के भारत में एक ऐसी मशीन बनाई है जो 1 सेकंड में ₹100000 कमाती है । 
Harjeet Brar Bajakhana Kabbadi
Harjeet brar with his wife and daughter


  • आगे चलकर हरजीत बराड़ ने अपना विवाह नरेंद्र कौर के साथ करवाया और नरेंद्र कौर से उन्ह एक लड़की भी हुई । अपनी लड़की का नाम हरजीत बराड़ ने गगन हरजीत कौर रखा । 
Harjeet Brar Bajakhana Kabbadi | Biography | Age | Family | Death

साल 1997 - 98 हरजीत बराड़ की चर्चा पूरी दुनिया में हो रही थी वहीं जब हरजीत बराड़ द्वारा कनाडा में कबड्डी खेलने गए तो उनकी 1 रेड पर $35000 डॉलर लगे जिनकी अगर हम रुपयों में आज बात करें तो लगभग 1830000 रुपए सी । 

Harjeet Brar Death 


दोस्तो जैसे के कुदरत का नियम है कि जो इस धरती पर आया है उसे वापस भी जाना पड़ेगा । ऐसा ही एक मंदभागा दिन आया जब 16 अप्रैल 1998 को अपने साथी खिलाड़ी तलवार कौंके , केवल लोपोके , केवल सीखा और सुखचैन सिंह के साथ अपनी जिप्सी PB 10 U 0097 में दिल्ली की ओर जा रहे थे
Harjeet Brar Bajakhana Kabbadi

 तो अचानक ही रास्ते में मोरिंडा के पास उन का एक ट्रक के साथ हादसा हो गया । इस बात से मैं हरजीत बराड़ की मौके पर ही मौत हो गई इसके अलावा , तलवार,  केवल सीखा और केवल लोपोके की भी हरजीत के साथ ही मौत हो गई इस के इलावा इन का एक साथी सुखचैन सिंह को गम्भीर चोटें आई । 

Thursday, 10 January 2019

Manoj Bajpayee Biography in Hindi (कैसे गरीब किसान का बेटा बना करोड़पति)

"मंजिले उन्ही को मिलती है जिनके सपनों में जान होती है पंखों से कुछ नहीं होता हौसलों से उड़ान होती है "।  इस कहावत को किसी ने सही साबित किया है तो वह है फिल्म जगत में अपनी रियल एक्टिंग से सभी को प्रभावित करने वाले एक्टर मनोज बाजपाई ।

Manoj Bajpayee Biography in Hindi (कैसे गरीब किसान का बेटा बना करोड़पति)
Manoj Bajpayee Biography in Hindi
Manoj Bajpayee Biography in Hindi

जिनोह ने अपनी मेहनत और संघर्ष के दम पर यह दिखा दिया इस दुनिया में कुछ भी नामुमकिन नही है । एक गरीब किसान के वहां पैदा होने के बाद पूरा बचपन और जवानी परेशानियों में गुजारने वाले मनोज बाजपेई ने किस तरह से फिल्म जगत में अपनी एक अलग पहचान बनाई । बिना आप का समय लिए हुम् आप को Manoj Bajpayee की इस प्रेरणादायक कहानी को शुरू से बताते हैं ।
 

Manoj Bajpayee Biography in Hindi (कैसे गरीब किसान का बेटा बना करोड़पति)





कहानी की शुरुआत होती है 23 अप्रैल 1969 से जब बिहार के बेलवा नाम के गांव में मनोज बाजपाई का जन्म हुआ । उनके पिता का नाम राधाकांत बाजपेई है जो कि अपने परिवार के पालन-पोषण के लिए पूरी तरह से खेती पर निर्भर थे ।  दोस्त मनोज बाजपेई का नाम के सिनेमा के लेजेंड मनोज कुमार के नाम पर रखा गया था ।  जो के उन के पिता के पसन्दीदा एक्टर थे ।


(मनोज बाजपाई का बचपन - Childhood of Manoj Bajpayee )


Manoj Bajpayee का बचपन बहुत ही ज्यादा गरीबी में बीता यहां तक कि उनके पिता के पास में पढ़ाने के लिए पर्याप्त पैसे भी नहीं थे । इसके लिए उन्होंने अपने शुरुआती पढ़ाई गांव के एक सरकारी स्कूल से की । 

मनोज वाजपेई के पिता जानते थे के अगर उन के बेटे ने खेतीबाड़ी से हट कर कोई और काम करना है तो यह पढ़ाई बहुत ही ज्यादा जरूरी है और इसीलिए उन्होंने पैसे कर्ज लेकर मनोज के पढ़ाई को जारी रखा और फिर मनोज बाजपेई ने अपनी 12वीं की पढ़ाई महारानी जानती कॉलेज की  ।

उस वक़्त Manoj Bajpayee की उम्र 17 साल थी । तभी उन्होंने दिल्ली जाकर अपने कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने का डिसीजन लिया और फिर यहां पहुंच कर उन्होंने रामजस कॉलेज से अपनी पढ़ाई शुरू कर दी ।  कॉलेज के पढ़ाई के दौरान उनोह ने थिएटर में काम करना शुरू किया और वही से उन्हें पहचान मिलनी शुरू हुई ।

(कैसे आपने आप को खत्म करने का सोचा)


लेकिन उसको जैसे जैसे उनका एक्सपीरियंस बड़ा यह पता लग गया कि अगर भारतीय फिल्म जगत में काम पाना है तो उसके लिए उन्हें बहुत ही कड़ी मेहनत करनी होगी और जिस के लिए उनोह ने दिल्ही के ही National School of Drama में एडमिशन ले लिया ।



हालांकि यहां पर एडमिशन के लिए उन्होंने तीन बार अप्लाई किया लेकिन इसके बावजूद हर बार उन्हें रिजेक्ट कर दिया जाता था । मनोज बताते हैं के इस वजह से उन के होंसले टूटने लगे थे ।

 इस समय तो उन्होंने सुसाइड करने तक भी का सोचा था । लेकिन उनके एक दोस्त रघुबीर यादव ने उन्हें सलाह दी अगर उन्हें NSD में नहीं लिया जा रहा है तो Berryjohn के एक्टिंग वर्कशॉप के लिए उन्हें एक बार जरूर ट्राय करनी चाहिए ।

Manoj Bajpayee Biography in Hindi (कैसे गरीब किसान का बेटा बना करोड़पति)

फिर जब वाजपेई बैरी जॉन से मिले तब बैरी जॉन उसे इतना ज्यादा प्रभावित हुए उन्होंने मनोज बाजपाई को एक विद्यार्थी के तौर पर नहीं बल्कि दूसरे लोगों को एक्टिंग सिखाने में उनकी मदद के लिए रख लिया। 

फिर कुछ समय यहां पर काम करने के बाद मनोज बाजपेई ने एक बार फिर से नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में अप्लाई किया लेकिन उसको एप्लीकेशन और कैंडिडेट नहीं एक अधिआपक के तौर पर था । इस वर NSD ने उन्हें अपनी टीम में लेने में देरी नही की ।

Film Career



ऐसे ही करके बहुत ही जल्दी मनोज दिल्ली के थिएटर जगत के जाने माने चेहरे बन चुके थे । उस समय के काफी डायरेक्टर तिग्मांशु धूलिया ने शेखर कपूर की एक फ़िल्म Bandit Queen के लिए बुलाया और इस फ़िल्म में मनोज ने मान सिंह नाम के एक डाकू का रोल खूब अछि तरह से निभाया ।
Manoj Bajpayee Biography in Hindi


Manoj Bajpayee Biography in Hindi (कैसे गरीब किसान का बेटा बना करोड़पति)


फिर एक बार फिल्म जगत में काम मिलने के बाद 1994 में Manoj बाजपाई मुम्बई शिफ्ट हो गए और जहां पर उनोह ने छोटे छोटे TV सीरियल में काम करना शुरू किया । 

लेकिन यह किरदार उनके प्रतिभा के साथ न्याय नहीं कर रहे थे और इस तरह से फिल्म इंडस्ट्री में आने के बाद उन्हें यहां भी बहुत ही स्ट्रगल भरे दिन देखने पड़े लेकिन जल्दी अब मनोज बाजपाई के दिन बदलने वाले थे क्योंकि राम गोपाल वर्मा ने 1998 अपनी फ़िल्म Satya के लिए मनोज को साइन किया ।

( Manoj Bajpayee Films and Awards )


इस फ़िल्म ने मनोज की किस्मत को बदल दिया । यह फ़िल्म बहुत बड़ी हिट साबित हुई । अब मनोज बॉलीवुड के बड़े बड़े फ़िल्मकर्स की नज़रो में आ चुके थे । इस फील।के लिए मनोज को Best Supporting Actor के अवार्ड से भी नवाजा गया ।

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 इस तरह से यही फिल्म मनोज के जीवन का टर्निंग पॉइंट साबित हुई इस के बाद मनोज ने AKS, LOC KARGIL, RAJNEETI, AARAKASHN, GANGS OF WASSYPUR, SPECIAL 26, ALIGARH, SATAMEVA JAYATE, जैसी ही कई फिल्मो में काम किया । समय के साथ साथ Manoj Bajpayee ने अपनी एक्टिंग को और सुधारा ।

( Persnal Life Of Manoj Bajpayee )


मुझे मनोज बाजपेई के पर्सनल लाइफ के बारे में बात करें उनोह ने 2006 में सबाना रजा नाम की एक्ट्रेस से शादी की जिसे हुम् नेहा के नाम से जानते हैं । जिस के बाद मनोज के घर एक बेटी जन्म लिया  ।



Manoj Bajpayee Biography in Hindi


अंत  में बस मैं यही कहना चाहूंगा जो भी मुकाम आज मनोज ने अपनी ज़िन्दगी में पाया है वो अपनी मेहनत और आपने परिवार के सपोर्ट की वजह से है ।

Wednesday, 12 December 2018

Phoolan Devi Biography in Hindi - फूलन देवी का जीवन परिचय


Phoolan Devi Biography in Hindi - फूलन देवी का जीवन परिचय

फूलन देवी एक ऐसी लड़की जिसका छोटी जाति में लड़की के तौर पर जन्म पाना मानो उस के लिए एक अभिशाप बन गया था । लेकिन फिर भी उनकी आंखों में डर ना हो कर साहस की तपन दिखती थी ।

Phoolan Devi Biography in Hindi - फूलन देवी का जीवन परिचय
Phoolan Devi Biography in Hindi - फूलन देवी का जीवन परिचय
फूलन देवी एक ऐसी लड़की जिसका छोटी जाति में लड़की के तौर पर जन्म पाना मानो उस के लिए एक अभिशाप बन गया था । लेकिन फिर भी उनकी आंखों में डर ना हो कर साहस की तपन दिखती थी ।


Phoolan Devi Biography in Hindi - फूलन देवी का जीवन परिचय:

बचपन से ही जीवन संघर्षों के बीच घिर चुका था । एक के बाद एक बहुत सारे जुल्म हो रहे थे ऊंची जाति के लोग भेदभाव और यौन उत्पीड़न करते रहे और ऐसे में दूसरा कोई होता तो अपने जीवन को पूरी तरह से खत्म करने की सोचता लेकिन फूलन देवी जैसे निडर महिला ने अपने ऊपर हुए जुल्मो का ऐसा बदला लिया के लोग उसे इज्जत की नज़रों से देखने लगे । आज हम फूलन देवी की इस कहानी को शुरू से जाने गे । कैसे एक साधारण लड़की डाकू बनी और डाकू से राजनेता ।

Phoolan Devi Biography in Hindi - फूलन देवी का जीवन परिचय

(जनम और बचपन) 

कहानी की शुरुआत होती है 10 अगस्त 1963 से जब उत्तर प्रदेश के जालौन जिले के एक छोटे से गांव में मल्लाह के अंतर्गत फूलन देवी का जन्म हुआ।

 मल्लाह बेसिकली नाव चलाने वालों और मछुआरों के समुदाय को कहा जाता था और इस समुदाय में जन्म लेने की वजह से शुरू से ही फूलन देवी ने गरीबी का सामना किया उनके बड़े से ज्वाइन फैमिली के पास 1 एकड़ जमीन थी ।  जिस में पुराना नीम का पेड़ लगा हुआ था ।

 जब फूलन 11 वर्ष की थी तो उनके दादा दादी की मौत हो गई । फिर घर के मुखिया फूलन देवी के पिता के बड़े भाई बने और फिर घर के मुखिया पद को संभालने के बाद से उनका कहना था कि खेत में मौजूद पुराने नीम के पेड़ को काट देना चाहिए ताकि पेड़ वाले एरिया में भी उपजाऊ खेती किया जा सके ।

Phoolan Devi Biography in Hindi - फूलन देवी का जीवन परिचय

 इस बात से फूलन देवी के पिता भी काफी हद तक सहमति थी लेकिन 11 साल की फूलन देवी को यह बिल्कुल भी समझ नहीं आई और पेड़ काटने गए अपने चचेरे भाई को गालियां देते हुए खदेड़ दिया ।

फिर दोनों के बीच जमकर गाली ग्लोच हुआ । फूलन देवी की जुबान से निकले शब्दों को समाज स्वीकार नहीं कर पा रहा था क्योंकि गांव में कभी भी किसी महिला ने पुरुष के खिलाफ इस तरह की आवाज नहीं उठाई थी

और फिर इसका नतीजा यह हुआ कि फूलन देवी का जबरन उसे 3 गुना ज्यादा उम्र के व्यक्ति के साथ बाल विवाह करवा दिया गया और उनके पति का नाम था पुत्तीलाल भल्ला । शादी के बाद से पुत्ती लाल फूलन देवी के ऊपर बहुत सारा अत्त्याचार करता रहा।
Phoolan Devi Biography in Hindi - फूलन देवी का जीवन परिचय
Phoolan Devi Biography in Hindi - फूलन देवी का जीवन परिचय
इन्हीं सभी बातों से तंग आकर फूलन देवी ने अपने ससुराल से भागने का फैसला कर डाला और फिर वहां से भाग कर अपने मायके आ गई लेकिन यहां पर भी उन्हें बहुत सारे अपमान झेलने पड़े ।

एक वार फिर से फूलन देवी का सामना हुआ उनके चचेरे भाई मयदीन के साथ । क्योंकि अभी भी उनसे पेड़ वाले झगड़े के लिए बदला लेना चाहता था और फिर बदले की भावना से मयदीन ने नजदीकी पुलिस स्टेशन में जाकर फूलन देवी के खिलाफ चोरी का इल्जाम लगा दिया और फिर फूलन देवी को 3 दिन जेल में बिताने पड़े लेकिन शर्मशार कर देने वाली बात यह थी कि पुलिस थाने में पुलिस वालों ने फूलन के साथ कई वार बलात्कार किया ।

Phoolan Devi Biography in Hindi - फूलन देवी का जीवन परिचय

फिर डरा धमका कर  फूलन को छोड़ दिया और फिर वापस घर आने के बाद फूलन देवी को फिर से ससुराल भेजने की तैयारी की जाने लगी ।

उन्होंने पहले तो फूलन देवी को अपनाने से मना किया लेकिन कुछ पैसे देने के बाद से वह भी राजी हो गए हैं और अपनी ऑटो बायोग्राफी फूलन देवी ने बताया कि उनका पति वापस आने के बाद उन्हें बहुत मारता और जबर्दस्ती उन के साथ संबध बनाता ।

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इन सभी बातों से तंग आकर 16 साल की उम्र में फूलन देवी एक बार फिर से अपने ससुराल से भाग निकली लेकिन इस बार वह अपने मायके नहीं गई बल्कि उस ने 2 वक़्त की रोटी के लिए डाकुओं के गैंग को जॉइन कर लिया ।

 इस गैंग में शामिल होने वाली वह पहली लड़की थी और फिर धीरे-धीरे समय बीतने के साथ उनके साथी डाकुओं में भी उनका कद बड़ा होने लगा था और कुछ महीनों के बाद फूलन देवी ने एक-एक करके अपने सभी जुल्मो का बदला लेना शुरू किया ।

Phoolan Devi Biography in Hindi - फूलन देवी का जीवन परिचय
Phoolan Devi Biography in Hindi - फूलन देवी का जीवन परिचय
फूलन ने एक ही गांव के 22 राजपूतों को एक लाइन में खड़ा कर गोलियों से भून डाला । इसके अलावा फूलन ने कई पुलिस वालों को मौत के घाट उतार दिया जिन्होंने उनके साथ बलात्कार किया था । इन सभी घटनाओं के बाद बहुत सारे लोग फूलन को देवी के रूप में पूजने लगे ।

क्यों कि उस ने अपने सम्मान के लिए राजपूतों का नरसंहार का डाला । एक साथ 22 कत्ल करने के बाद फूलन देवी सभी अखबारों और टीवी चैनलों की सुर्खियों में आ गई जिसके बाद सरकार ने फूलन के ऊपर ध्यान देना शुरू किया स्पेशल आर्मी फोर्स और पुलिस ने मिलकर फूलन देवी को ढूंढ निकाला और उनके बाकी साथियों को पुलिस इनकाउंटर में मार दिया गया ।

Phoolan Devi Biography in Hindi - फूलन देवी का जीवन परिचय


 यहां से 2 साल के बाद फूलन देवी को गिरफ्त में ले लिया गया और फिर उनके साथ के बाकी कुछ बचे हुए डाकूओ ने भी 1983 में पुलिस के सामने आत्म सम्परपन कर दिया ।

फूलन देवी के ऊपर 48 अपराधों का आरोप था जिस में कत्ल , लूट, जैसे मामले दर्ज थे । फूलन को उम्र भर जेल में रखने का आदेश दिया कि 11 साल जेल में गुजारने के बाद 1994 में जब मुलायम सिंह जादव की सरकार उत्तर प्रदेश में बनी तो फूलन पर लगे सभी आरोप से उन्ह बरी कर दिया गया ।

समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर फूलन देवी ने दो बार लोकसभा के मेंबर ऑफ पार्लियामेंट का चुनाव मिर्जापुर से अपने नाम किया ।
Phoolan Devi Biography in Hindi - फूलन देवी का जीवन परिचय


25 जुलाई 2001 को दिल्ली बंगले के बाहर 3 लोगो ने उसे भून डाला ।
पर इस तरह से फूलन देवी ने दुनिया को अलविदा कह दिया और 200 फूलन देवी को मारे जाने के पीछे शेर सिंह राणा का हाथ बताया जाता है इस पर 22 राजपूतों को एक लाइन में खड़ा करके मारने का बदला लिया ।

दोस्तों से थी बैंडिट क्वीन  फूलन देवी की कहानी हमने फूलन देवी की ऑटो बायोग्राफी का लिंक भी  अपने लेख में दिया है अगर आप खरीदना चाहते हैं तो उसे लिंक पर क्लिक करें और आपको हमारा लेख कैसा लगा हमें कमेंट करके जरूर बताएं अपना कीमती समय देने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद ।

Wednesday, 21 November 2018

Paan Singh Tomar Biography | History | Real Story hindi ( पान सिंह तोमर की जीवनी )

Paan Singh Tomar Biography | History | Real Story hindi( पान सिंह तोमर की जीवनी ) पानसिंह, फूलन देवी, माधव सिंह और मुस्तकीम यह सभी ऐसे खतरनाक डाकुओं के नाम है जिसके बगावत की कहानी चंबल की पहाड़ियों में सुनने को मिल जाएंगी । खूंखार डाकुओं ने चंबल की घुमावदार और टेढ़ी-मेढ़ी पहाड़ियों में पनाह ले रखी थी साथ ही साथ यहाँ पर ही अपने आतंक के पहियों को भी आगे बड़ा रहे थे लेकिन इन में से एक कहानी ऐसी भी सामने आती है जो कि उसे बिल्कुल ही विपरीत थी और यह कहानी है डकैत Paan Singh Tomar की । 

Paan Singh Tomar Biography | History | Real Story ( पान सिंह तोमर की जीवनी )
Paan Singh ने अपनी जीवन के शुरुआती दौर में लोगों का प्यार और सम्मान जीता लेकिन वही उम्र के दूसरे दौर में उन्हें लोगों की नफरत झेलनी पड़ी और एक बागी की तरह अपना जीवन बिताना पड़ा । 




Paan Singh Tomar Biography | History | Real Story hindi ( पान सिंह तोमर की जीवनी )


कहानी की शुरुआत होती है 1932 से मध्यप्रदेश के मुरैना जिले के एक छोटे से गांव की दशा में पान सिंह तोमर का जन्म हुआ । वोह बचपन से ही देश की सेवा करना चाहते थे और इसे आगे चलकर उन्होंने भारतीय सैनिक के तौर पर अपना कैरियर बनाया और फिर पहली बार उनकी जॉइनिंग उत्तराखंड के रुड़की नाम के शहर में सूबेदार के पद पर हुई और दोस्तों सेना में जाने के बाद ही उन्हें पता चला कि एक सिपाही होने के साथ साथ वह एक अच्छे ऐथलीट भी हैं ।

Paan Singh Tomar Biography | History | Real Story ( पान सिंह तोमर की जीवनी )
उन में बिना थक्के बहुत दूर तक भागने का हुनर था । जिस को देखते हुए उन्हें खेलों के लिए तैयार किया गया और फिर सेना में रह कर ना सिर्फ एक सिपाही होने का फर्ज निभाया बल्कि एक होनहार नेशनल खिलाड़ी के रूप में देश का नाम भी रोशन किया । 

Paan Singh ने टोकियो में 1958 में हुई एशियाई गेम्स में भारत को तरफ  से खेले थे और 7 सालों तक Steeplechase के चैंपियन भी रहे । वहीँ 9 मिनट 2 सेकंड 3000 मीटर की दौड़ का बेहतरीन रिकॉर्ड बनाया था जिस को कि अगले 10 सालों तक कोई नहीं तोड़ सका था । खेल में उनके प्रदर्शन को देखते हुए सरकार ने उन्हें1962 और 65 में हुए युद्ध मे लड़ने की अनुमति नही दी । 
शायद देश इस जांबाज खिलाड़ी को कभी नहीं खोना चाहता था और इस तरह से आगे चल कर 1972 में पान सिंह रिटायर हो गए । रिटायरमेंट के बाद से वह बची हुई जिंदगी को चैन से बिताने के लिए अपने गांव वापस आ गए लेकिन गांव वापस आने के बाद से वहां के एक दबंग बाबू सिंह के साथ उनका जमीनी विवाद हो गया । बाबू सिंह पूरे गांव पर अपना धाक जमा कर रखता था और उसके पास लोगों को डराने के लिए 7 लाइसेंसी बंदूक भी थी । 

Paan Singh Tomar Biography | History | Real Story hindi ( पान सिंह तोमर की जीवनी )




पान सिंह तोमर और बाबू सिंह के बीच विवाद इस बात पर हुआ कि बहुत समय पहले पान सिंह पूर्वजों ने बाबू सिंह के पास अपनी जमीन गिरवी रखी हुई थी । 

Paan Singh जब वापस अपनी जमीन लेने गए तब बाबू सिंह ने उनकी जमीन को वापस करने के लिए साफ साफ मना कर दिया और फिर लड़ाई झगड़े से दूरी बनाए रखने वाले पान सिंह तोमर इस विवाद को सुलझाने के लिए अपने जिले के कलेक्टर के पास जा पहुंचे जहां पर भी अपने जीवन की उपलब्धियां और मेडल को लेकर गए । 

लेकिन कलेक्टर ने पान सिंह की किसी भी बात को नही सुना और उल्टा उनके मेडल्स और डॉक्यूमेंट को फेंक कर उन्हें बेइज्जत करके वहां से बाहर निकाल दिया ।

फिर यहीं से पान सिंह को अपने अभी तक के अचीवमेंट्स बेकार लगने लगे थे कि अभी भी हार ना मानते हुए पान सिंह ने गांव के पंचायत से इस मुद्दे के लिए इंसाफ की गुहार लगाई । पंचायत ने फैसला सुनाया की जमीन को छुड़वाने के लिए पान सिंह तोमर को ₹3000 देने होंगे ।

 लेकिन यह फैसला पान सिंह तोमर को बिल्कुल भी समझ नहीं आया और उन्होंने जमीन को पाने के लिए यह रकम चुकाने से साफ साफ मना कर दिया लेकिन बदले की भावना से कुछ दिनों के बाद से ही बाबू सिंह ने अपनी दबंगई दिखाने शुरू कर दी । 

जब एक दिन पान सिंह घर पर नही थे तो उनोह ने पान सिंह की बूढ़ी मा को खूब मारा । घर पहुंचने पर अपनी मां को घायल देख पान सिंह तोमर पूरी तरह से आग बबूला हो गए और फिर उन्होंने गलत रास्ते पर ही सही लेकिन अपना बदला लेने का फैसला किया और यहीं से शुरू हो जाती है पान सिंह तोमर की बागी बनने की कहानी ।

Paan Singh Tomar Biography | History | Real Story ( पान सिंह तोमर की जीवनी )

1 दिन पान सिंह तोमर अपने भतीजे बलवंत के साथ मिलकर बाबू सिंह को घेरने की कोशिश करने लगे और लगभग 1 किलोमीटर तक बाबू सिंह को दौड़ाने के बाद तोमर की बंदूक की गोलियां बाबू सिंह को भून डालती हैं। इस तरह से पान सिंह अपनी शवि एक खिलाड़ी से बदलकर चंबल के खतरनाक डाकू के चेहरे में तब्दील हो जाती है ।

आगे चलकर पान सिंह तोमर नाम खतरनाक डकैती और हत्या करने के लिए जाना जाने लगा और वह इतना खतरनाक हो चुका था कि पुलिस भी उस के नाम से कांपती थी और उस समय पान सिंह को पकड़ने के लिए ₹10000 का इनाम रखा गया । 



आखिरकार 1 अक्टूबर 1981 को इंस्पेक्टर महेंद्र प्रताप सिंह और उनके 500 जवानों की स्पेशल टीम ने तोमर की घेराबंदी करके उसे मार गिराया । इस  ऑपरेशन में तोमर के गैंग के 14 और भी साथ में मारे गए थे आपको बता दें कि यह लड़ाई 12 घंटे चली थी । 
Paan Singh Tomar Biography | History | Real Story ( पान सिंह तोमर की जीवनी )


आपको बता दें कि पान सिंह की बायोपिक साथ 2012 में रिलीज हुई मूवी पान सिंह तोमर के जरिए भी देख सकते हैं इस मूवी को नेशनल फिल्म अवार्ड फॉर बेस्ट फीचर फिल्म से भी नवाजा जा चुका है।  हुम् उम्मीद करते हैं कि आपको पान सिंह तोमर की यह कहानी पसंद आई होगी ।

Wednesday, 14 November 2018

Acharya Chankaya Biography | Books | History | Kuttlaya | Chankaya Neeti | Hindi

Acharya Chankaya Biography | Books | History | Kuttlaya | Chankaya Neeti | Hindi : भारत में बहुत से ऐसे महान लोगों ने जन्म लिया जिन्होंने अपने ज्ञान के बलबूते परअपना नाम इतिहास के पन्नों में दर्ज करवा दिया और ऐसे ही समझदार लोगों की लिस्ट में एक नाम सामने आता है आचार्य चाणक्य का ।

जो कि एक टीचर, फिलॉस्फर, राजनेता और एक रॉयल एडवाइजर थे और इन्हें पूरी दुनिया की सबसे महान पॉलीटिशियन के तौर पर जानती है । चाहे बीता हुआ पुराना समय हो या फिर आज का सफल व्यक्ति बनने के लिए हर कोई चाणक्य द्वारा बताए गए  असूलों पर ही चलना चाहता हैं ।

Acharya Chankaya  Biography | Books | History | Kuttlaya | Chankaya Neeti | Hindi
Acharya Chankaya  Biography | Books | History | Kuttlaya | Chankaya Neeti | Hindi

आज हम महान जानी चाणक्य की पूरी लाइफ स्टोरी को जानते हैं कि किस तरह से अपने अपमान का बदला लेने के लिए उन्होंने नंद वंश को खत्म कर मौर्य शासन की नींव रखी ।

चाणकय का जन्म और बचपन
( Birth and Childhood of Chankaya )


कहानी की शुरुआत होती है आज से करीब 371 ईसा पूर्व पहले । जब चाणक्य नाम के एक गांव में चाणक्य का जन्म हुआ और यह गांव बेसिकली उस समय गोल्ल रीजन के अंतर्गत आता था ।

चाणक्य को लोग कौटिल्य और विषनगुप्त के नाम से भी जानते थे । चाणक्य के दिमाग को देखते हुए उनके पिता ने उन्हें तक्षशिला के एक स्कूल में पढ़ाई करने के लिए भेज दिया और वहां पर चाणक्य अर्थशास्त्र और वेदों के बारे में अच्छी जानकारी हो गई ।


Acharya Chankaya Biography | Books | History | Kuttlaya | Chankaya Neeti | Hindi


वहीं चाणक्य को पढ़ाने का मौका भी मिला । चाणक्य के समय में एक जगह हुआ करता था पाटलिपुत्र जिसे की आज हम पटना के नाम से जानते हैं और उस समय पाटलिपुत्र एक बहुत ही शक्तिशाली राज्य मगध की राजधानी था ।

चाणकय को बेइज्जत करना 


मगद पर उस समय नंद वंश का साम्राज्य था और वहां के राजा धनानंद के ने एक बहुत बड़ा सा यज्ञ करवाया । उस समय चाणक्य भी वहीं पर मौजूद थे और फिर चाणक्य ब्रह्मभोज के समय ब्राह्मण के गद्दी पर जा बैठे ।

जब राजा धनानंद वहां आए तो उन्होंने चाणकय के पहनावे को देख कर भरी सभा में उनका मजाक बनाया और आचार्य चाणक्य को ब्रह्मभोज के बीच में ही गद्दी से उठा दिया ।

इसी वजह से क्रोधित होकर आचार्य चाणक्य ने अपनी चोटी खोल दी और राजा धनानंद को कहा कि वह नंद वंश का सफाया कर ही चोटी बांधगे ।

चाणकय ने अपनी बेज्जती का बदला कैसे लिया ?


यहां से ही आचार्य चाणक्य का मकसद हो गया कि वह नंद वंश का सफाया कर अपने द्वारा किसी चुने गए आदमी को मगध का राजा बनाएगा । इसके बाद आचार्य चाणक्य जंगल में चले गए और वहां जाकर उन्होंने सोने के सिक्के बनाए ।

Acharya Chankaya  Biography | Books | History | Kuttlaya | Chankaya Neeti | Hindi

जो के किसी खास मकसद के लिए बनाए गए थे । उन्होंने करीब 800 मिलीयन सिक्के बनाकर जंगल में ही कहीं दफन कर दिए और किसी ऐसे आदमी की खोज में निकल गए जो नंद वंश के राजा धनानंद की जगह ले सके ।

चंद्रगुप्त मौर्या से दोस्ती 


इसी दौरान आचार्य चाणक्य ने एक बच्चे को दूसरे बच्चों के साथ बहादुरी से लड़ते हुए देखा ।उसे देखने के बाद ही अचार्य चाणक्य जी समझ गए थे की यह लड़का नंद वंश का सफाया कर सकता है और क्या उसके बारे में पता लगाया तो पता चला कि यह लड़का मौर्य साम्राज्य का वंश चंद्रगुप्त मौर्य है । जिसके पिता की हत्या राज्य के लालच में कर दी गई थी और उन्हें राज सिंहासन से निकाल दिया गया था ।

इसी दौरान आचार्य चाणक्य की दोस्ती नंद वंश के राजा धनानंद के बेटे से हो गई वह बी गद्दी के बिल्कुल काबिल था लेकिन अचार्य चाणक्य को चंद्रगुप्त मौर्य और धनानंद के बेटे में से किसी एक को चुनना था और इसीलिए उन्होंने दोनों की परीक्षा लेने का फैसला किया ।

चंद्रगुप्त मौर्या की परीक्षा


आचार्य चाणक्य ने दोनों को एक एक धागा दिया और उनको अपने गले में डालने के लिए कहा । जिसके बाद अचार्य चाणकय ने धनानंद के बेटे को चंद्रगुप्त के गले से वह धागा निकालने के लिए कहा ।

लेकिन शर्त यह थी की जब चंद्रगुप्त मौर्य सो रहे हो उस वक़्त यह धागा निकलना था और उसे पता व नही चलना चाहिए था । लेकिन धनानन्द के पुत्र जब भी धागा निकालने जाते तो चंद्रगुप्त को पता चल जाता इसलिए वह असफल रहा ।

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फिर अचार्य चाणक्य ने चंद्रगुप्त मौर्य को वही धागा धनानंद के बेटे गले से निकालने के लिए कहा । जब धनानंद के बेटे सो रहे थे तो चंद्रगुप्त ली उसका गला काट दिया और वह धागा आचार्य चाणक्य को सौंप दिया जिससे अचार्य चाणक्य को मगध का नया राजा मिल चुका था ।

जिसके बाद आचार्य चाणक्य ने वोह सिक्के निकाल कर एक बड़ी फ़ौज तयार की जिसके बलबूते पर चंद्रगुप्त मौर्य और अचार्य चाणक्य ने नंद वंश के राजा धनानंद को हराकर अपना साम्राज्य कायम किया और उस साम्राज्य में आचार्य चाणक्य प्रधानमंत्री के रूप में रहे ।

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इस तरह से अचार्य चाणक्य ने अपने आप को एक सफल और समझदार राजनेता होने का परिणाम दिया । जब तक चाणकय जिंदा रहे उनोह एक अच्छे राजनेता की तरह शाषन किया ।

चाणकय दुवारा लिखी गई किताबे
( Books of Chankaya )


इसी दौरान चाणकय ने 2किताबें भी लिखी जिस में पहली थी ' Chankaya Neeti ' जिस में उनोह ने बताया कि एक अच्छे राजा को कैसे काम करना चाहिए जिस से उन की प्रजा उन्हें प्यार करे । दूसरी किताब थी ' Arthshashter ' जिस में उनोह ने अर्थशास्त्र से जुड़े कुछ नियम बताएँ हैं ।


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चाणकय की मृत्यु
( Death Of Chankaya )


चाणकय की मृत्यु को लेकर विद्वानों के अलग अलग विचार हैं । कुछ विद्वानों का कहना है कि चाणकय ने खाने और जल का त्याग कर दिया था और यह त्याग तब तक किया जब तक उनकी मृत्यु नही हो गई ।

दूसरा विचार यह भी है कि जिस स्तर पर चाणकय पहुंच चुके थे उस वक़्त उनके बहुत से दुश्मन बन चुके थे । जिस के तहत उन की मृत्यु एक षड्यंत्र के तहत हुई थी ।

तो दोस्तो यह थी महान राजनेता चाणकय की कहानी । अगर आप को इस लेख से जुड़ी और जानकारी के बारे में पता है जो इस लेख में नही दी गई तो कृपया आप हमें जरूर बताएं । अपना समय देने के लिए आप का बहुत बहुत धन्यवाद ।

Tuesday, 2 October 2018

Baba Harbhajan singh Real Story and History in Hindi - बाबा हरभजन सिंह

Baba Harbhajan singh Real Story and History in Hindi  बाबा हरभजन सिंह क्या कभी कोई सैनिक मृत्यु के पश्चात भी अपनी ड्यूटी कर सकता है ?

क्या किसी मृत सैनिक की आत्मा अपना कर्तव्य निभाते हुए देश की सीमा पर रक्षा कर सकती है ?

आप सबको यह सवाल अजीब लग रहा है आप सब कहते होंगे कि भला ऐसे कैसे हो सकता है । लेकिन सिक्कम में रहने वाले लोगों और वहां पर तैनात सैनिकों से अगर आप सवाल पूछेंगे तो वह कहेंगे जी हां ऐसा पिछले 45 सालों से लगातार हो रहा है । उन सब का मानना है कि पंजाब रेजीमेंट के जवान हरभजन सिंह की आत्मा पिछले 45 सालों से लगातार देश की सीमा पर रक्षा कर रही है । 

सैनिकों का कहना है कि आत्मा चीन की तरफ से होने वाले किसी भी हमले के बारे में उन्हें बता देती है और यदि भारतीय सैनिकों को चीन के सैनिकों का कोई भी मूवमेंट पसंद नहीं आता है तो उसके बारे में और चीन के सैनिकों को भी पहले ही बता देते हैं ताकि बात ज्यादा नहीं बिगड़े और मिलजुलकर बातचीत से उसका हल निकल जाए ।
Baba Harbhajan singh Real Story and History in Hindi - बाबा हरभजन सिंह

आप चाहे इस पर यकीन करें या ना करें पर खुद चीनी सैनिक भी इस पर विश्वास करते हैं इसलिए भारत और चीन के बीच होने वाली हर फ्लैग मीटिंग में हरभजन सिंह के नाम की या खाली कुर्सी लगाई जाती है ताकि वह मीटिंग अटेंड कर सके ।

Baba Harbhajan singh Real Story and History in Hindi - बाबा हरभजन सिंह 

हरभजन सिंह का जन्म 30 अगस्त 1946 को जिला गुजरावाला में जो कि वर्तमान पाकिस्तान में हुआ । हरभजन सिंह पंजाब रेजीमेंट के जवान थे जो कि 1966 में आर्मी में भर्ती हुए थे पर मात्र 2 साल की नौकरी करके 1968 में सिक्किम में एक दुर्घटना में मारे गए । एक दिन वह खच्चर पर बैठकर नदी पार कर रहे थे तो खच्चर सहित नदी में बह गए और काफी आगे निकल गए ।



  2 दिन की तलाशी के बाद जब उनका शव नहीं मिला तो वह एक साथ के सपने में आकर अपने शव की जगह बताई और सुबह वही से शव बरामद कर अंतिम संस्कार किया ।

हरभजन सिंह के इस चमत्कार के बाद साथी सैनिकों की उन में आस्था बड़ गई । उन्होंने उनके बंकर को एक मंदिर का रूप दे दिया । जब बाद में उनके चमत्कार बढ़ने लगे और विशाल जनसमूह की आस्था का केंद्र हो गए । तो उनके लिए एक मंदिर का निर्माण किया गया जो है बाबा हरभजन सिंह मंदिर । 

Baba Harbhajan singh Real Story and History in Hindi - बाबा हरभजन सिंह 

यह मंदिर 13000 फुट की ऊँचाई पर है । बंकर वाला मंदिर इस मंदिर से 1000 फिट ज्यादा ऊंचाई पर स्थित है । मंदिर के अंदर बाबा हरभजन सिंह की एक फोटो और उनका सामान रखा है । बाबा हरभजन सिंह अपनी मृत्यु के बाद से ही लगातार ड्यूटी दे रहे हैं इनके लिए बकायदा तन्खाह भी दी जाती है । उनकी भारतीय सेना में बकायदा एक रैंक है जिस को नियमानुसार उनका प्रमोशन भी किया जाता है ।

यहां तक कि उन्हें कुछ साल पहले तक 2 महीने की छुट्टी पर गांव भी भेजा जाता था । इसके लिए ट्रेन में सीट रिजर्व की जाती थी । 3 सैनिकों के साथ उनका सारा सामान उनके गांव भेजा जाता था तथा 2 महीने पूरे होने पर वापस सिक्कम लाया जाता था ।

जब हरभजन सिंह छुटी पर होते थे तो सारा बॉर्डर हाई अलर्ट पर रहता था । क्योंकि उस वक्त सैनिकों को बाबा की मदद नहीं मिल पाती थी लेकिन बाबा का सिक्किम से जाना और वापस आना एक धार्मिक आयोजन का रूप लेता जा रहा था । 

Baba Harbhajan singh Real Story and History in Hindi - बाबा हरभजन सिंह 

जिसमें की बड़ी संख्या में जनता इकट्ठी होने लगी कुछ लोग इस आयोजन को अंधविश्वास को बढ़ावा देने वाला मानते थे । इसलिए उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया । क्योंकि सेना में किसी भी प्रकार का अंधविश्वास की मनाही है लिहाजा सेना ने बाबा हरभजन को छुट्टी पर भेजना बंद कर दिया । अब बाबा साल के 12 महीने ड्यूटी देते हैं ।

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मंदिर में बाबा का एक कमरा भी है जिस में प्रतिदिन सफाई करके बिस्तर लगाया जाता है बाबा की सेना की वर्दी और जूते रखे जाते हैं । कहते हैं कि रोज उनके कमरे की सफाई करने पर उनके जूतों में कीचड़ और चादर में सरवटे पाई जाती है । बाबा हरभजन सिंह का मंदिर सेनिको और लोगों की आस्था का केंद्र है ।
Baba Harbhajan singh Real Story and History in Hindi - बाबा हरभजन सिंह



इस इलाके में आने वाला हर नया सैनिक सबसे पहले बाबा की धूप लगाने आता है । इस मंदिर को लेकर यहां के लोगों में एक अजीब सी मान्यता यह भी है इस मंदिर में पानी से भर कर पानी की बोतलें रखी जाती हैं कहा जाता है कि उस पानी में चमत्कारिक औषधीय गुण आ जाते हैं । 

इस पानी को पीने से लोगों के रोग मिट जाते हैं । इसलिए इस मंदिर के नाम पर बोतलों का अंबार लगा रहता है । यह पानी 21 दिन के अंदर प्रयोग में लाया जाता है और इस दौरान मांसाहार व शराब करना निषेध होता है ।

दोस्तो यह थी बाबा हरभजन सिंह की रहस्यमयी कहानी । आप को हमारा लेख कैसा लगा हमे कमेंट करके जरूर बताएं ।

Saturday, 29 September 2018

Conman Natwarlaal Biography | History | Real Story in Hindi - ठग नटवरलाल की जीवनी

Conman Natwarlaal Biography | History | Real Story in Hindi - ठग नटवरलाल की जीवनी :  मिथिलेश कुमार श्रीवास्तव एक ऐसा नाम है जिस नाम को सुनकर आपको शायद कोई चेहरा याद नहीं आ रहा होगा लेकिन वहीं अगर नटवरलाल नाम लिया जाए तो आप लगभग मुहावरा बन चुके इस नाम को कभी भूल ही नहीं पाए होंगे । 
Conman Natwarlaal Biography | History | Real Story in Hindi - ठग नटवरलाल की जीवनी

अपनी संगीन और चालाकी भरी ठगी से एक समय काफी मशहूर नटवरलाल को ढूंढने के लिए भारत की पुलिस ने एड़ी से चोटी तक की ताकत लगा दी थी । लेकिन यह ठग जितनी रहस्यमई तरीके से हिरासत में लिया जाता था उतने ही नाटकीय तरीके से फरार भी हो जाया करता और जो सबसे ज्यादा हैरान कर देने वाली बात तो यह है कि यह भारत का एकमात्र ऐसा ठग था जिस ने ठगी के लिए न तो कभी किसी हथ्यार का इस्तेमाल किया और ना ही किसी से पैसे छीने ।




नटवरलाल सिर्फ और सिर्फ अपनी बातों के तीर चलाता और सामने वाला इंसान खुद फंस जाता । तो चलिए दोस्तो आज हम जानते हैं नटवरलाल की कहानी ।

History of Natwarlaal 


तो इस कहानी की शुरुआत होती है 1912 में जब बिहार के एक छोटे से गांव मंगरा में नटवरलाल का जन्म हुआ । बताया जाता है कि नटवरलाल का बचपन से ही पढ़ाई में ज्यादा मन नहीं लगता था लेकिन खेल में वह सब से आगे थे । अपने स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद उस ने  वकालत में डिग्री हासिल की और वकील बन गया ।

 वकालत की पढ़ाई का इस्तेमाल उस ने ठगी के काम के लिए किया और वह अपनी चालसाजी और ठगी को अंजाम देने के लिए नोबेल की कहानियों से आइडिय लिया करता था ।  हर बार नटवरलाल अपने अनोखे अंदाज और अलग-अलग नाम और पहचान के साथ ठगी करता और यही वजह थी के लोग उसे पकड़ने में नाकाम रहते ।

बताया जाता है कि उसके शिकार में ज्यादातर तो मिडल क्लास के सरकारी कर्मचारी होते थे । जा छोटे शहर के पैसे वाले व्यापारी जिनसे नटवरलाल ताजमहल वेचने तक का सौदा कर लेता था और यह तो छोटे शहर के व्यापारियों से तीन बार ताजमहल बेचने में भी सफल हो गया था ।


Conman Natwarlaal Biography | History | Real Story in Hindi - ठग नटवरलाल की जीवनी


 इसके अलावा उसने राष्ट्रपति भवन और संसद भवन को भी नीलाम कर दिया था । कहतें हैं कि नटवरलाल ने अपने जीवन काल में  52 से ज्यादा नामों का इस्तेमाल करके अरबों खरबों रुपए की ठगी को अंजाम दिया । 

यहां तक कि अपनी गजब की कमेंसिंग पावर और खुद पर अटूट विश्वास की वजह उस ने सरकार को यह दावा किया था कि अगर सरकार उसे आगिआ दे तो वो भारत का सारा विदेशी कर्ज़ उतार सकता है ।

आपको यह जानकर हैरानी होगी कि नटवरलाल ने खुद का एक स्कूल सिर्फ इसलिए खोला था ताकि वह बच्चों के घर का फाइनेंसियल कंडीशन जान सके और फिर आमिर घरों से लाखों रुपए ठग कर फरार हो गया था ।

इसके अलावा नटवरलाल शॉर्ट सिगनेचर करने में भी बहुत ही माहिर था वह अपने टैलेंट की वजह से देश के नामी व्यापारियों को अपना निशाना बनाते जिस में  टाटा, बिरला, धीरूभाई अंबानी को भी अपना निशाना बना चुका था और उसने बहुत सारे लोगो को जाली चेक और ड्राफ्ट दे कर लाखों की ठग्गी कर गया था ।
Conman Natwarlaal Biography | History | Real Story in Hindi - ठग नटवरलाल की जीवनी
नटवरलाल दुवारा दिया गया एक चेक 



नटवरलाल100 से भी ज्यादा मामलों में दोषी पाया गया था । जिसकी वजह से 8 राज्यों की पुलिस उसे पूरी शिद्दत के साथ ढूंढ रही थी । नटवरलाल को उसके ठगी के लिए 113 साल की सजा सुनाई गई लेकिन उस ने सिर्फ 20 साल ही जेल की हवा खाई ।

Conman Natwarlaal Biography | History | Real Story in Hindi - ठग नटवरलाल की जीवनी

वह 9 बार गिरफ्तार किया गया था लेकिन कैसे भी करके हर बार नए नए तरीके से वह फरार हो जाता और उसके फरार हो जाने की वजह से कई सारे सिपाही और थानेदार भी निलंबित किए गए थे । आखिरी वार वह 1996 में ग्रिफ्तार किया गया था । उस वक़्त उस की उम्र 84 साल थी लेकिन इस उम्र में भी वोह पुलिस की गरिफ्त से भागने में सफल रहा ।

नटवरलाल ने अपने किसी भी काम को लेकर कभी शर्मिंदगी महसूस नही की । वह कहता था कि वो लोगो से कभी हथ्यार दखा कर पैसे नही लेता । उस का कहना था कि " मैं लूट कर गरीबों को देता हूं और मैंने कभी भी किसी हथियार का इस्तेमाल भी नहीं किया है ।

Conman Natwarlaal Biography | History | Real Story in Hindi - ठग नटवरलाल की जीवनी


 लोगों से बहाने बनाकर पैसे मांगे और लोग हाथ जोड़कर पैसे देते गए" और ऐसे अपराधों को अंजाम देने के बावजूद नटवरलाल के फैन्स की कमी नहीं थी ।
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नटवरलाल हिरासत के वक़्त 



यहां तक कि बिहार में उसके गांव के लोगों की मांग थी के नटवरलाल नाम का एक समार्ग बनना चाहिए ।  लोगों का मानना था कि भला आदमी था वह गरीबो की मदद करता था । नटवरलाल की मृत्यु को लेकर अभी भी असमंजस है।
  नटवरलाल के भाई गंगा प्रसाद श्रीवास्तव का कहना है कि 1996 में उन्होंने नटवरलाल का अंतिम संस्कार कर दिया था लेकिन उनके वकील बताते हैं कि 25 जुलाई 2009 को उनकी मृत्यु हुई और इसीलिए उन्होंने 2009 में ही कोर्ट में अनुरोध किया कि नटवरलाल के खिलाफ लगे  सभी अपराधों को खत्म कर देना चाहिए ।

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